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Monday, August 14, 2017

I

I am the master, I am the student 
I am the creator and the destroyer
I am the sculptor and the statue 
I am the universe and the life within 

I who am blind am the vision 
I am the danger and the survival
I lies within, I cannot be destroyed 
I is the voyage abs the treasure

I is the resonance and the interference 

'I' is the enlightenment

Friday, June 2, 2017

जीवन का परिधान

दिनकर सा रोशन, रजनीश सा शालीन,
आसमान सा विशाल, नीला, गोया कालीन।
अर्थ से विहीन, निष्कर्ष से परे,
जीवन का परिधान।

सृष्टि की विवेचना, कवी की कल्पना,
गीत सा मधुर, पवन, सुरों की साधना।
योगी का त्याग, किसी सूफी का राग,
जीवन का परिधान।

रात का अंधकार, सुबह का उजाला,
आत्म-मंथन से जना, अमृत-रस का प्याला।
उत्तेजना से भयभीत, मृदुलता से संतुष्ट,
जीवन का परिधान।

Sunday, May 28, 2017

राहगिर

बड़ी दूर चले आएं हैं हम।

चलते - चलते,
गिरते - संभलते ,
कभी ठोकर खाते,
कभी हँसते, कभी हॅसातें,
कभी दिलों को बहलाते,
अधूरी तमन्नाओं से
दिल को समझाते,
कभी मज़िलों की तलाश में,
कभी दिल की दबी,
अनसुनी आवाज़  से

बड़ी दूर चले आएं हैं हम।

Sunday, June 26, 2016

एक अफसाना

तरन्नुम-ए -वफ़ा के अफ़साने पुराने हैं 
लोग कहते हैं हम आप के दीवाने है, 
आँखों से बह निकले थे अश्क जो 
उनमे आज भी सपने सुहाने है 

मोहब्बत तो खेल है नसीबों का 
और हम तो बदनसीब पुराने है 
तरन्नुम-ए -वफ़ा के अफ़साने पुराने हैं 
लोग कहते हैं हम आप के दीवाने है

भूल जा

जो बात जुबान पर  आ  न  सकी,
जो अश्क  आख्नो पे आ  न  सके 
कुछ  जस्बात  जो  अफसाना  बन कर  रह  गए,
वो चाहतें जो पूरी न हुई.
भूल जा उनको, ए-दिल,
बीतीं यादें समझ कर

हर आह जो दिल से निकली तो सही
कहीं ठिठक, रुक सी गयी
हर  जख्म  जिसे  वक़्त  ने  भरा  तो  सही
किसी की याद  जिन्हें  कुरेद  के  चली  गयी.
भूल जा  उनको, ए -दिल,
बीतीं  यादें  समझ  कर .

यादें

लम्हा लम्हा बिखरती यादों में,
तड़पते दिल के जज़्बातों में
धुधला गयी हैं यादें तेरी
सांझ के साये भी अब गहराते है. 

दूर थी मंजिलें मेरी,
इस लिए तेरा साथ माँगा था
पर ना मिल सका साथ, कोई गम नहीं
पहले भी तो दरिया अकेले ही लांघा  था.

पत्ता -पत्ता झड गया इस पतझड़ में
पर सावन फिर से आएगा.
नील गगन में काले बदल सा
गरज कर फिर से छाएगा.

फिर बरसेगी वर्षा ऋतु
फिर नाचे गे मोर कहीं
फिर आयेंगे कोमल कल्ले
फिर चमन यह  लहराएगा.

फिर आयेंगे नवल पत,
फिर से चहकेंगी कोयल भी
बढ़  कर बनेगा विशाल  तरु
कोई मंजरी  जिसपर  बलखाएगी.     

Thursday, March 3, 2016

निरार्थ

उन पैमानों में थोड़ी सी जाम छोड़ आएं हैं ।

माना काफ़िर हैं वो, मगर उनके पास
अपना धर्म और ईमान छोड़ आएं हैं |

टटोला जेबों को जब, फ़ोन था, चाभियां भी थीं
दुनियादारी की चौखट पे मगर, ज़मीर का सामान छोड़ आएं है।

न मिला पाएंगे नज़र तुमसे ऐ 'चिराग'  '
बीती उम्र के पास अपने ख़्वाब और अरमान छोड़ आएं हैं।

उन पैमानों में थोड़ी सी जाम छोड़ आएं हैं ।